पाठ 115: तेजस्वी सूर्य का आगमन

शारीरिक चेतना की अंधेरी मायावी रात में लोग चीजों को वैसा नहीं देख सकते हैं जैसा वे हैं, और इस तरह और अधिक भ्रमित हो जाते है। जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है जवानी अधूरी महसूस होती है और साथ ही धीरे-धीरे स्वास्थ्य खराब होने लगता है, ऐसे में असंतुष्ट और उदास महसूस करना स्वाभाविक है। यह एक स्वाभाविक नियति है उनके लिए जो शारीरिक अवधारणा में तल्लीन रहते है।

लेकिन यदि कोई वैदिक ज्ञान के तेजस्वी सूर्य से आत्मज्ञानी बनता है, तो वह अपने पारलौकिक आध्यात्मिक स्वभाव को पूरी तरह से साकार कर सकता है, वह अपने बुढ़ापे में स्वाभाविक रूप से हंसमुख और उत्साही बन सकता है, मृत्यु के समय तक। और फिर अपने शरीर को छोड़ने पर वह एक शाश्वत आध्यात्मिक रूप प्राप्त कर लेगा जो ज्ञान और आनंद से भरा हुआ है और हमेशा के लिए श्रीकृष्ण के संग में अद्भुत आध्यात्मिक जगत में रह सकता है।

इस सप्ताह के लिए कार्य

भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 5, श्लोक 16 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:
कृष्णभावनामृत की तुलना सूर्य से क्यूँ करी गई?

अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com

(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)

3 replies on “पाठ 115: तेजस्वी सूर्य का आगमन”

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ज्ञान से प्रबुद्ध होता है, जिससे अविद्या का विनाश होता है, तो उसके ज्ञान से सब कुछ उसी तरह प्रकट हो जाता है, जैसे दिन में सूर्य से सारी वस्तुएँ प्रकाशित हो जाती हैं |
भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 5, श्लोक 16

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कृष्णाभावनामृत की तुलना सूरज से इसलीये की गई है जैसे सूर्योदय के बाद ही हर एक वस्तू का वास्तविक स्वरुप दिखाई देता है वैसे ही कृष्णाभावनामृत ज्ञान से जो भी अंदर अज्ञान है उसका नाश होता है ।

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भगवान श्री कृष्ण में लाखो सूर्यो का तेज है और उनकी कृपा से सारी निश्तेज चीजे (क्रोध, मोह ,माया, आदि )हमारे जीवन से दूर हो जाती है कृष्ण कृपा के बाद सभी चीजों का सत्य पता चलता है सभी मे कृष्ण है सिर्फ कृष्ण है हरे कृष्ण

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