कृष्ण इस अध्याय में एक बहुत ही जीवंत चित्र चित्रित करते हैं। उल्टा बरगद के पेड़ का यह सादृश्य मन में बस चिपक जाता है।
क्या आपने कभी त्रुटिपूर्ण दर्पण में अपने प्रतिबिंब को देखा है? या शायद एक विशेष रूप से बनाया गया दर्पण? कुछ ऐसे दर्पणों में आप खुद को बहुत लंबा, कुछ में बहुत छोटा देख सकते हैं। कुछ दर्पणों में आपका प्रतिबिंब लहरदार, या अजीब तरह से विकृत दिखता है। तो हम देखते हैं कि परावर्तक सतह निर्धारित करती है कि हम परावर्तन को कैसे समझते हैं। उदाहरण के लिए यदि आप किसी नदी में किसी इमारत का प्रतिबिंब देखते हैं, तो इमारत चलती हुई प्रतीत होती है, हालांकि यह स्थिर है।
हम दुनिया को कैसे समझते हैं? हमारी चेतना से। यदि हमारी चेतना स्पष्ट है, तो हम सब कुछ वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा वह है। यदि यह स्पष्ट नहीं है, तो हम एक विकृत प्रतिबिंब देखते हैं। यही कारण है कि अलग-अलग लोग तथ्यों के एक ही समूह को अलग-अलग तरीके से समझते हैं।
श्रीला प्रभुपाद इस सुंदर सादृश्य को विस्तार से बताते हैं।
क्या आप भौतिक दुनिया के उल्टा पेड़ के बारे में अधिक जानना चाहेंगे?
इस सप्ताह के लिए कार्य
भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 15, श्लोक 1 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:
क्या आप अपने स्वयं के किसी अनुभव का वर्णन कर सकते हैं जहाँ आपने कुछ देखा था लेकिन सोचा था कि यह कुछ और था?
अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com
(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)
