पाठ 367: एक ही समय में निकट और दूर

श्लोक 13.16

बहिरन्तश्र्च भूतानामचरं चरमेव च।
सुक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत।| १६।|

बहिः – बाहर; अन्तः – भीतर; च – भी; भूतानाम् – जीवों का; अचरम् – जड़; चरम् – जंगम; एव – भी; च – तथा; सूक्ष्मत्वात् – सूक्ष्म होने के कारण; तत् – वह; अविज्ञेयम् – अज्ञेय; दूर-स्थम् – दूर स्थित; च – भी; अन्तिके – पास; च – तथा; तत् – वह।

भावार्थ

परमसत्य जड़ तथा जंगम समस्त जीवों के बाहर तथा भीतर स्थित हैं। सूक्ष्म होने के कारण वे भौतिक इन्द्रियों के द्वारा जानने या देखने से परे हैं। यद्यपि वे अत्यन्त दूर रहते हैं, किन्तु हम सबों के निकट भी हैं।

तात्पर्य

वैदिक साहित्य से हम जानते हैं कि परम-पुरुष नारायण प्रत्येक जीव के बाहर तथा भीतर निवास करने वाले हैं। वे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगतों में विद्यमान रहते हैं। यद्यपि वे बहुत दूर हैं, फिर भी वे हमारे निकट रहते हैं। ये वैदिक साहित्य के वचन हैं। आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः (कठोपनिषद् १.२.२१)। चूँकि वे निरन्तर दिव्य आनन्द भोगते रहते हैं , अतएव हम यह नहीं समझ पाते कि वे सारे ऐश्र्वर्य का भोग किस तरह कर सकते हैं। हम इन भौतिक इन्द्रियों से न तो उन्हें देख पाते हैं, न समझ पाते हैं। अतएव वैदिक भाषा में कहा गया है कि उन्हें समझने में हमारा भौतिक मन तथा इन्द्रियाँ असमर्थ हैं। किन्तु जिसने, भक्ति में कृष्णभावनामृत का अभ्यास करते हुए, अपने मन तथा इन्द्रियों को शुद्ध कर लिया है, वह उन्हें निरन्तर देख सकता है। ब्रह्मसंहिता में इसकी पुष्टि हुई है कि परमेश्र्वर के लिए जिस भक्त में प्रेम उपज चुका है, वह निरन्तर उनका दर्शन कर सकता है। और भगवद्गीता में (११.५४) इसकी पुष्टि हुई है कि उन्हें केवल भक्ति द्वारा देखा तथा समझा जा सकता है। भक्त्या त्वनन्यया शक्यः|

इस सप्ताह के लिए कार्य

भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 13, श्लोक 16 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:
कृष्ण एक ही समय में हमारे निकट और दूर कैसे हो सकते हैं?

अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com

(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)