इस श्लोक में यह आश्चर्यजनक है जब अर्जुन कहता है, “हे हृषिकेश! आपके नाम के श्रवण से संसार हर्षित होता है और सभी लोग आपके प्रति अनुरक्त होते हैं” अर्जुन के ऐसा कहने पर हम स्वाभाविक रूप से आश्चर्य करते हैं कि फिर पूरा संसार अब कृष्णभावनाभावित क्यों नहीं है। अर्जुन श्लोक के दूसरे भाग में इसका उत्तर देते हैं, “यद्यपि सिद्धपुरुष आपको नमस्कार करतेहैं, किन्तु असुरगण भयभीत हैं और इधर-उधर भाग रहे हैं” इससे हम समझ सकते हैं कि व्यावहारिक रूप से वर्तमान समय में पूरा मानव समाज राक्षसों की श्रेणी में है, और इसीलिए वे कृष्ण की ओर आकर्षित नहीं होते हैं। इसका अर्थ है कि हमारे कृष्णभावनामृत आंदोलन का लक्ष्य वर्तमान राक्षसी आबादी को हरे कृष्ण का जाप करने और कृष्ण प्रसाद चखने में लगाकर भक्त बनाना है। कठिनाई यह है कि भले ही हम कहते हैं, “जप करो, जप करो, जप करो,” उनका उत्तर होता है, “नहीं कर सकते, नहीं कर सकते, नहीं कर सकते।”
इस सप्ताह के लिए कार्य
भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 11, श्लोक 36 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:
आपके पास क्या विचार हैं कि हम राक्षसों को भक्तों में कैसे बदल सकते हैं?
अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com
(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)
