कृष्ण के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बातों में से एक यह है कि यद्यपि वे कभी वृंदावन नहीं छोड़ते, वे हर जगह हैं। वे सर्वव्यापी हैं। वे हर परमाणु के भीतर हैं और हर परमाणु के बीच भी हैं। इससे अधिक आश्चर्यजनक व्यक्ति कौन हो सकता है? इस संबंध में श्रील प्रभुपाद ने 7 जून 1976 को लॉस एंजिल्स में दिए गए एक व्याख्यान में इस प्रकार समझाया:
“शास्त्र में कहा गया है: वृंदावनं परित्यज न पदं एकं गच्छति। कृष्ण कभी वृंदावन नहीं छोड़ते। वे कहीं नहीं जाते। वे हमेशा वहीं मौजूद रहते हैं। लेकिन फिर भी, वे हर जगह हैं।”
यह कैसे संभव है?
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, यद्यपि भगवान कृष्ण समय या स्थान द्वारा सीमित नहीं हो सकते, वे अपने शुद्ध भक्तों के प्रेम से सीमित हो जाते हैं। इस तरह भगवान कृष्ण कभी वृंदावन से बाहर एक कदम भी नहीं रखते। वृंदावन में उनके भक्तों का अगाध प्रेम उन्हें हमेशा वहीं रखता है। इस तरह भगवान कृष्ण अपने भक्तों के प्रेम के वश में हो जाते हैं।
इसलिए हमें वृंदावनवासियों से सीखना चाहिए कि जिस व्यक्ति को कभी कैद नहीं किया जा सकता, उसे हमेशा अपने दिल में कैसे कैद रखा जाए।
इस सप्ताह के लिए कार्य
भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 10, श्लोक 37 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:
उस कृष्ण को कैसे पकड़ा जाए, जिसे कभी पकड़ में आ नहीं सकते?
अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com
(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)
