चूँकि हमारी इन्द्रियाँ अपूर्ण हैं इसलिए उनसे मिलने वाला ज्ञान भी अपूर्ण है। हम किसी चीज़ को वैसा ही देखते हैं जैसा हम उसे समझते हैं, जबकि वह उससे बिल्कुल अलग होती है जैसा हम उसे समझते हैं। और हमने अपनी अपूर्ण इंद्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने के इस दोषपूर्ण सिद्धांत पर एक पूरी सभ्यता का निर्माण कर दिया है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वर्तमान विश्व सभ्यता इतनी अराजकता में है।
इस सप्ताह के लिए कार्य
भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 10, श्लोक 21 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:
इस श्लोक और तात्पर्य के आधार पर अपने शब्दों में आधुनिक विज्ञान की एक बड़ी भ्रांति की व्याख्या करें और यह भ्रांति आधुनिक अनुभवजन्य विज्ञान की अंतर्निहित भ्रांति का लक्षण क्यों है।
अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com
(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)
