पाठ 121: दुख में अपने जीवन को व्यर्थ न करें

मुझे हमेशा याद रहता है वो दिन जब मैंने पहली बार हरे कृष्ण मंदिर में रात बिताई थी। मैं बर्कले, कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका में रहने वाला एक 21 वर्षीय गीतकार था। वर्ष 1969 था। एक बहुत ही प्यारा और अद्भुत भक्त माकनलाल दास, जिन्हें मैं अक्सर बर्कले के टेलीग्राफ एवेन्यू पर मिलता था, ने मुझे सैन फ्रांसिस्को के प्रसिद्ध नाइट-ऐशबरी जिले के हरे कृष्ण मंदिर में रात बिताने के लिए आमंत्रित किया। यह 518 फ्रेडरिक स्ट्रीट में सैन फ्रांसिस्को का मूल इस्कॉन मंदिर था। मुझे याद है कि हम मंदिर के कमरे के नीचे बने तहखाने में सोए थे। सुबह उठने के बाद, मेहमानों के लिए मंदिर के कमरे में दीवार पर एक खूंटे पर लटके हुए जाप माला का लाभ उठाते हुए मैंने पहला हरे कृष्णा का जाप किया। फिर सुबह के कार्यक्रम के बाद जब मैं बर्कले वापस जा रहा था तो आनंद और उत्साह के सबसे अद्भुत एहसास ने मेरी चेतना को भर दिया। मैं सचमुच परमानंद में हँस रहा था जब मैं बर्कले की ओर लौटने समाए बे ब्रिज पार कर रहा था। और फिर उस शाम जब मैं बर्कले में कुछ दोस्तों के साथ था, जो एक बेवक़ूफ़ी भरा टेलीविजन शो देख रहे थे, मुझे एक गहरी प्रेरणा मिली। मैं उस टीवी शो में चूसे जाने से बचने के लिए, बाहर जाकर बरामदे का आश्रय लिया और एक गीत लिखा, जिसमें यह पंक्ति थी, “क्या आपको लगता है कि मैं अपना समय भटकते हुए व्यर्थ कर दूँगा, जब मैं इतना करीब हूँ असीमित आनंद के?”। हरे कृष्ण मंदिर में हुए अनुभव ने मुझे यह अनुमान दिया था कि मैं जल्द ही आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करूंगा जिसकी मुझे लम्बे समाए से तलाश थी। मैं सोच रहा था, “मैं बिलकुल नहीं चाहूँगा की एक टेलीविज़न शो, जिसमें पूरी तरह से महत्व, अर्थ, और प्रचुरता का अभाव है, के कारण मेरी चेतना विपरीत दिशा में चली जाए। मुझे यह मूल्यवान पाठ हमेशा याद रहता है जो कृष्ण ने मुझे दिया था। इस भौतिक दुनिया की तथाकथित आनंददायक बातें दुख का छलावा है। एक भक्त छलावे द्वारा मूर्ख नहीं बनता। इसके बजाय वह अपनी चेतना को सर्वोच्च वास्तविकता पर केंद्रित करता है, जिनके हम सभी एक अंश मात्र हैं और भक्ति योग प्रणाली के माध्यम से खुद को उस सर्वोच्च वास्तविकता के साथ सामंजस्य स्थापित करता हैं।

इस सप्ताह के लिए कार्य

भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 5, श्लोक 22 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:
भक्त भौतिक आनंद को कष्ट के रूप में क्यू और कैसे देखता है?

अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com

(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)