पाठ 116: भ्रमित न हों

भौतिक ऊर्जा या माया हमें हमेशा भक्ति के मार्ग से दूर करने का प्रयास कर रही है और जन्म और मृत्यु के चक्र में उलझाई रखती है। जो लोग बुद्धिमान हैं, वे कभी भी माया को खुद को भ्रमित नहीं करने देते, भले ही उसके प्रस्ताव कितने भी लुभावने क्यों न हों। हरिदास ठाकुर रात में एकांत स्थान पर हरे कृष्ण मंत्र का जाप कर रहे थे, जब एक बहुत ही सुंदर युवा लड़की उनके पास आई और बार-बार, उनसे संभोग करने की विनती की। उनकी चेतना को थोड़ी सी भी नहीं भटकी क्योंकि वह भगवान के पवित्र नामों के जप से मिलने वाले असीमित आनंद में पूरी तरह से डूबे हुए थे। वह इतने सुसज्जित और दयालु थे कि उन्होंने उस लड़की को तुरंत उस स्थान को छोड़ने का आदेश देने के बजाय चतुराई से उसे कहा की वह जप पूर्ण होने के बाद उसकी इच्छा को पूरा करेंगे। इस तरह उन्होंने उसे अपने जप के पूर्ण होने का इंतजार करने के लिए तीन रातों के लिए आने के लिए प्रेरित किया। लेकिन कृष्ण के परम भक्त, श्री हरिदास ठाकुर के होठों से पवित्र नाम इतने मधुर स्वर में गाते हुए सुनाई देने के बाद, उसका दिल पिघल गया और वह उनके चरण कमलों में पूर्ण आत्मसमर्पण करने के लिए गिर पड़ी और एक महान ऋषि को प्रदूषित करने के प्रयास के लिए क्षमा मांगी। बेशक हम हरिदास ठाकुर जैसे श्रेष्ठ भक्तों की नकल नहीं कर सकते। लेकिन हम कृष्ण भक्ति के मार्ग पर हमेशा अविरल रूप से स्थिर रहने के लिए उनकी दया की भीख माँग सकते हैं।

इस सप्ताह के लिए कार्य

भगवद-गीता यथा रूप अध्याय 5, श्लोक 17 को ध्यान से पढ़ें और इस प्रश्न का उत्तर दें:

परमात्मा या ब्राह्मण के रूप में जानने के बजाए सर्वोच्च वास्तविकता को भगवान के रूप में समझना क्यों महत्वपूर्ण है?

अपना उत्तर ईमेल करें: hindi.sda@gmail.com

(कृपया पाठ संख्या, मूल प्रश्न और भगवद गीता अध्याय और श्लोक संख्या को अपने उत्तर के साथ अवश्य शामिल करें)

One reply on “पाठ 116: भ्रमित न हों”

जब भी मनुष्यकी बुद्धी , मन , निष्ठा और आश्रय भगवान के उपर स्थिर होती है तब वह सहजगतिसे मुक्तीपथपर अग्रेसर हो जाता है और उसको परम सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है ।

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